माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का धरना: पालकी रोके जाने से शुरू हुआ विवाद, संत समाज और राजनीति में उबाल

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प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान सनातन परंपरा और प्रशासन के बीच एक बड़ा विवाद सामने आया है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पुलिस प्रशासन के खिलाफ धरने पर बैठ गए हैं। यह मामला उस समय गरमाया जब मौनी अमावस्या के अवसर पर संगम स्नान के लिए जा रही उनकी पालकी को प्रशासन द्वारा रोक दिया गया। इस घटना के बाद शंकराचार्य ने अन्न-जल त्याग कर वहीं धरना शुरू कर दिया, जिससे धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई।

क्या है पूरा मामला?

माघ मेला हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र आयोजन माना जाता है, जिसमें संतों, महात्माओं और श्रद्धालुओं की विशेष भूमिका होती है। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद मौनी अमावस्या के दिन परंपरागत रूप से संगम स्नान के लिए पालकी यात्रा में शामिल हो रहे थे। आरोप है कि इसी दौरान पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पालकी को आगे बढ़ने से रोक दिया

शंकराचार्य और उनके समर्थकों का कहना है कि यह केवल एक प्रशासनिक रोक नहीं, बल्कि सनातन परंपराओं का अपमान है। इसी विरोध में उन्होंने वहीं धरने पर बैठने का निर्णय लिया और अन्न-जल त्याग की घोषणा की।

धरने के बाद बढ़ा विवाद

धरना शुरू होते ही यह मामला स्थानीय स्तर से निकलकर राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। कई संत संगठनों ने शंकराचार्य के समर्थन में बयान जारी किए। संत समाज का कहना है कि माघ मेले जैसे धार्मिक आयोजन में संतों की गरिमा और परंपराओं का सम्मान होना चाहिए, न कि उन्हें रोका जाए।

धरने के दौरान शंकराचार्य ने स्पष्ट कहा कि उनका विरोध किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ है जो धार्मिक परंपराओं को समझे बिना फैसले लेती है।

संत समाज और ब्राह्मण संगठनों की प्रतिक्रिया

इस घटना के बाद उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में संत समाज और ब्राह्मण संगठनों में नाराजगी देखी गई। कई जगहों पर सांकेतिक धरना और विरोध प्रदर्शन किए गए। संगठनों ने प्रशासन से सार्वजनिक माफी और भविष्य में ऐसी घटनाएं न दोहराने की मांग की है।

संतों का कहना है कि यदि शंकराचार्य जैसे प्रतिष्ठित धर्मगुरु के साथ ऐसा व्यवहार हो सकता है, तो आम संतों और श्रद्धालुओं की स्थिति क्या होगी।

राजनीति भी हुई सक्रिय

यह मुद्दा अब राजनीति में भी प्रवेश कर चुका है। विपक्षी दलों ने इसे धार्मिक भावनाओं से जोड़ते हुए सरकार पर निशाना साधा है। कुछ स्थानों पर राजनीतिक दलों ने एक-दिवसीय भूख हड़ताल कर शंकराचार्य के समर्थन में आवाज उठाई।

वहीं सत्तापक्ष की ओर से कहा जा रहा है कि प्रशासन ने केवल सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाया, किसी भी धर्म या संत का अपमान करने का उद्देश्य नहीं था।

मध्यस्थता की अपील

कुछ प्रमुख संतों और धार्मिक नेताओं ने दोनों पक्षों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील की है। उनका कहना है कि आपसी टकराव से सनातन धर्म की छवि को नुकसान पहुंच सकता है, इसलिए शांति और संवाद का रास्ता ही बेहतर है।

वर्तमान स्थिति (Latest Update)

फिलहाल शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का धरना जारी बताया जा रहा है। प्रशासन की ओर से बातचीत के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन अब तक कोई औपचारिक समाधान सामने नहीं आया है। माघ मेले में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।

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