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अमेरिका में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों को लेकर एक अहम घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी सीनेट ने रूस से संबंधित प्रतिबंधों वाले एक व्यापक विधेयक को 86-11 वोट से मंजूरी दे दी है। इस बिल में रूस की ऊर्जा खरीद पर निर्भर देशों के खिलाफ अतिरिक्त व्यापारिक शुल्क लगाने का प्रावधान शामिल है। इसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को कुछ देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति मिल सकती है।
इस खबर का असर भारत पर भी पड़ सकता है, क्योंकि भारत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल है। हालांकि इस समय यह कहना सही नहीं होगा कि अमेरिका ने भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया है। अभी केवल सीनेट से बिल पारित हुआ है और इसकी आगे की विधायी प्रक्रिया बाकी है।
अमेरिकी सीनेट ने 86-11 वोट से दी मंजूरी
रॉयटर्स के अनुसार, अमेरिकी सीनेट ने संबंधित विधेयक को 86 वोट के मुकाबले 11 वोट से पारित किया। यह विधेयक रूस के अलावा ईरान से संबंधित प्रतिबंधों को भी मजबूत करने की दिशा में लाया गया है।
बिल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उन देशों को लेकर है जो रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदते हैं। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को ऐसे देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार मिल सकता है। अधिकतम दर 100 प्रतिशत तक हो सकती है।
इसका मतलब यह नहीं है कि बिल पास होते ही हर संबंधित देश पर 100 प्रतिशत शुल्क अपने आप लागू हो जाएगा। वास्तविक कार्रवाई के लिए आगे की कानूनी प्रक्रिया और प्रशासनिक निर्णय जरूरी होंगे।
भारत का नाम क्यों चर्चा में है?
भारत पिछले कुछ वर्षों में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले प्रमुख देशों में रहा है। वैश्विक ऊर्जा बाजार में बदलाव के बीच भारत ने अपनी जरूरतों और उपलब्ध विकल्पों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग देशों से ऊर्जा खरीद जारी रखी है।
इसी वजह से अमेरिका में रूस की ऊर्जा खरीद को लेकर तैयार किए गए इस कानून की चर्चा में भारत का नाम भी सामने आ रहा है। यदि भविष्य में अमेरिकी प्रशासन इस प्रावधान का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करता है, तो दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों पर इसका असर पड़ सकता है।
फिलहाल ऐसा कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है कि भारत पर 100 प्रतिशत शुल्क लगाया जाएगा। इसलिए मौजूदा स्थिति को संभावित नीति के रूप में समझना जरूरी है।
100 प्रतिशत टैरिफ का प्रावधान क्या कहता है?
बिल में अमेरिकी राष्ट्रपति को रूस की ऊर्जा खरीद पर निर्भर देशों के खिलाफ 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति देने का प्रावधान है।
यहां “100 प्रतिशत तक” को समझना महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी संबंधित देशों पर एक साथ 100 प्रतिशत टैरिफ लागू होगा। दर, देश और इसे लागू करने का फैसला अमेरिकी प्रशासन की आगे की कार्रवाई पर निर्भर करेगा।
इस प्रावधान का उद्देश्य रूस की ऊर्जा से होने वाली आय पर दबाव बढ़ाना और उसके प्रमुख खरीदारों को अपनी ऊर्जा खरीद नीति पर पुनर्विचार करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
चीन और अन्य देशों पर भी पड़ सकता है असर
भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जिसका नाम इस पूरे मामले में महत्वपूर्ण हो सकता है। चीन भी रूस से ऊर्जा खरीदने वाले बड़े देशों में शामिल है। इसके अलावा कुछ अन्य देश भी संभावित रूप से इस नीति के दायरे में आ सकते हैं।
रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावित टैरिफ व्यवस्था का उद्देश्य उन देशों पर दबाव बढ़ाना है जो रूस की ऊर्जा पर काफी निर्भर हैं। हालांकि अमेरिकी संसद में इस बात को लेकर भी चर्चा है कि इतने व्यापक टैरिफ अधिकारों का इस्तेमाल अमेरिकी अर्थव्यवस्था और कारोबार पर किस तरह का असर डाल सकता है।
अब अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में क्या होगा?
सीनेट से बिल पारित होने के बाद इसकी प्रक्रिया समाप्त नहीं हुई है। अब अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में इस पर विचार होना बाकी है। वहां सांसद बिल के प्रावधानों पर चर्चा कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर बदलाव भी प्रस्तावित किए जा सकते हैं।
रॉयटर्स के अनुसार, प्रतिनिधि सभा में कुछ सांसद राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ अधिकार देने को लेकर चिंतित हैं। उनका मानना है कि इस तरह की व्यवस्था का असर अमेरिकी कंपनियों और आम उपभोक्ताओं तक भी पहुंच सकता है।
इसलिए सीनेट की मंजूरी के बाद अब प्रतिनिधि सभा की भूमिका काफी महत्वपूर्ण हो गई है।
भारत-अमेरिका व्यापार पर क्या असर हो सकता है?
अगर भविष्य में भारत पर अतिरिक्त टैरिफ लगाया जाता है, तो इसका असर दोनों देशों के बीच व्यापार करने वाली कंपनियों पर पड़ सकता है। किसी उत्पाद पर अधिक आयात शुल्क लगने से उसकी लागत और व्यापार की परिस्थितियां बदल सकती हैं।
हालांकि अभी संभावित असर का निश्चित अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी। सबसे पहले यह देखना होगा कि प्रतिनिधि सभा बिल को किस रूप में आगे बढ़ाती है। इसके बाद राष्ट्रपति की ओर से इसका इस्तेमाल किस तरह किया जाता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा।
इसलिए फिलहाल भारत के कारोबार और अर्थव्यवस्था पर तत्काल प्रभाव की बात करना सही नहीं होगा।
रूस से ऊर्जा खरीद बना मुख्य मुद्दा
अमेरिकी सरकार और सांसद लंबे समय से रूस की ऊर्जा से होने वाली आय को सीमित करने के विकल्पों पर चर्चा करते रहे हैं। नई विधायी पहल इसी व्यापक नीति का हिस्सा है।
अमेरिकी सांसदों का तर्क है कि रूस की ऊर्जा खरीद करने वाले प्रमुख देशों पर आर्थिक दबाव डालकर रूस की ऊर्जा आय को प्रभावित किया जा सकता है। वहीं इस तरह के कदमों से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं।
इसी कारण प्रस्तावित टैरिफ को केवल अमेरिका और रूस के बीच का मामला नहीं माना जा रहा है। इसका असर उन देशों पर भी पड़ सकता है जो रूस से ऊर्जा खरीदते हैं।
भारत के लिए आगे की चुनौती क्या हो सकती है?
भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय व्यापार के बीच संतुलन बनाए रखना होगी। यदि अमेरिकी नीति में आगे कोई बदलाव आता है, तो भारत को अपनी ऊर्जा खरीद और व्यापारिक संबंधों के संदर्भ में स्थिति का आकलन करना होगा।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंध काफी व्यापक हैं। इसलिए किसी भी बड़े शुल्क या व्यापारिक बदलाव का प्रभाव केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रह सकता।
हालांकि फिलहाल भारत की ओर से आगे की स्थिति पर नजर रखना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमेरिकी कानून की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।
क्या भारत पर अभी 100% टैरिफ लग चुका है?
नहीं। यह इस खबर का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है।
अमेरिकी सीनेट ने जिस बिल को मंजूरी दी है, उसमें राष्ट्रपति को रूस की ऊर्जा पर निर्भर देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की शक्ति देने का प्रावधान है। लेकिन भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ अभी लागू नहीं हुआ है।
बिल को अभी अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की प्रक्रिया से गुजरना है। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि कानून किस रूप में आगे बढ़ता है और अमेरिकी प्रशासन इसके प्रावधानों का इस्तेमाल कैसे करता है।
इसलिए इस खबर को पढ़ते समय “100 प्रतिशत टैरिफ का प्रावधान” और “100 प्रतिशत टैरिफ लागू होना” इन दोनों बातों के बीच अंतर समझना जरूरी है।
भारत की नजर अब अमेरिकी संसद की अगली कार्रवाई पर
सीनेट में मतदान के बाद अब सभी की नजर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा पर रहेगी। वहां बिल को लेकर होने वाली चर्चा से आगे की दिशा स्पष्ट होगी।
यदि बिल में कोई बदलाव होता है, तो टैरिफ से जुड़े प्रावधान भी बदल सकते हैं। वहीं अगर प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो राष्ट्रपति के अधिकार और उनके इस्तेमाल को लेकर अगला चरण महत्वपूर्ण होगा।
भारत के लिए भी यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि रूस से ऊर्जा खरीद और अमेरिका के साथ व्यापारिक संबंध दोनों ही देश की आर्थिक नीति से जुड़े महत्वपूर्ण विषय हैं।
निष्कर्ष
अमेरिकी सीनेट से रूस से जुड़े इस बिल की मंजूरी ने भारत समेत रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों के लिए संभावित व्यापारिक दबाव की चर्चा जरूर बढ़ा दी है। बिल में अमेरिकी राष्ट्रपति को ऐसे देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत पर अभी 100 प्रतिशत शुल्क लागू हो गया है।
फिलहाल बिल सीनेट से 86-11 वोट के साथ पारित हुआ है और इसकी आगे की प्रक्रिया अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में होनी है। वहां चर्चा, संभावित बदलाव और आगे की मंजूरी के बाद ही तस्वीर ज्यादा साफ होगी।
भारत के लिए आने वाले समय में अमेरिकी फैसलों पर नजर रखना महत्वपूर्ण रहेगा। खास तौर पर यह देखना होगा कि प्रस्तावित व्यवस्था किस रूप में कानून बनती है और अमेरिकी प्रशासन इसका इस्तेमाल किन देशों के खिलाफ करता है। अभी के लिए सबसे सही बात यही है कि भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं हुआ है, बल्कि ऐसा टैरिफ लगाने की संभावित शक्ति वाले बिल को अमेरिकी सीनेट ने मंजूरी दी है।
