
हिंद महासागर के मध्य स्थित डिएगो गार्सिया एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में है। हाल की खबरों में सामने आया है कि इस रणनीतिक सैन्य अड्डे को लेकर ब्रिटेन और अमेरिका के बीच मतभेद उभर रहे हैं। इसके साथ ही मॉरीशस की संप्रभुता का मुद्दा, ईरान-अमेरिका तनाव और हिंद महासागर में शक्ति संतुलन की राजनीति इस पूरे मामले को और जटिल बना रही है। यह केवल एक द्वीप का विवाद नहीं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति का अहम अध्याय बन चुका है।
🔹 चागोस द्वीप समूह और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
Chagos Archipelago 1965 तक मॉरीशस के प्रशासनिक नियंत्रण में था। उसी वर्ष ब्रिटेन ने इसे अलग कर ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी घोषित कर दिया। बाद में अमेरिका और ब्रिटेन के बीच समझौते के तहत डिएगो गार्सिया को एक बड़े सैन्य अड्डे के रूप में विकसित किया गया।
1970 के दशक में यहां के मूल निवासियों को हटाया गया, जो आज भी अपने पुनर्वास और अधिकारों की मांग कर रहे हैं। यह मानवीय पहलू आज भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठता है और ब्रिटेन की नीतियों पर सवाल खड़े करता है।
डिएगो गार्सिया की लोकेशन इसे अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है। यह मध्य पूर्व, अफ्रीका और दक्षिण एशिया के बीच रणनीतिक रूप से स्थित है। यहां से लंबी दूरी के बमवर्षक विमान, नौसैनिक बेड़े और निगरानी मिशन संचालित किए जा सकते हैं।
🔹 मॉरीशस का दावा और अंतरराष्ट्रीय समर्थन
Mauritius लगातार यह दावा करता रहा है कि चागोस द्वीप समूह उससे अवैध रूप से छीना गया था। 2019 में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने सलाहकार राय दी कि ब्रिटेन को इस क्षेत्र पर अपना प्रशासन समाप्त करना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी मॉरीशस के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया।
हाल की खबरों में यह सामने आया है कि ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच एक समझौते का खाका तैयार किया गया है। इसके अनुसार चागोस द्वीप समूह की संप्रभुता मॉरीशस को दी जाएगी, जबकि डिएगो गार्सिया सैन्य बेस को लंबी अवधि की लीज पर ब्रिटेन और अमेरिका के पास रखा जाएगा।
यह मॉडल दोनों पक्षों के हितों को संतुलित करने की कोशिश माना जा रहा है, लेकिन इसी बिंदु पर नई राजनीतिक बहस शुरू हो गई है।
🔹 अमेरिका की सुरक्षा चिंता और ट्रंप का बयान
Donald Trump ने हाल ही में ब्रिटेन को चेतावनी दी कि वह इस रणनीतिक संपत्ति को लेकर जल्दबाज़ी न करे। अमेरिका के रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि डिएगो गार्सिया उसकी वैश्विक सैन्य रणनीति का एक केंद्रीय स्तंभ है।
अफगानिस्तान और इराक युद्ध के दौरान इस बेस का उपयोग किया गया था। यहां मौजूद लंबा रनवे और सुरक्षित भौगोलिक स्थिति अमेरिका को आपातकालीन परिस्थितियों में तुरंत प्रतिक्रिया देने की क्षमता देती है।
अमेरिका को यह आशंका है कि यदि संप्रभुता मॉरीशस को सौंप दी जाती है, तो भविष्य में राजनीतिक या कानूनी बाधाएं पैदा हो सकती हैं। हालांकि समझौते में लीज का प्रावधान है, फिर भी अमेरिकी नीति-निर्माता किसी भी संभावित जोखिम को लेकर सतर्क हैं।
🔹 ईरान फैक्टर और क्षेत्रीय तनाव
Iran और अमेरिका के बीच संबंध पहले से ही तनावपूर्ण हैं। परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय प्रभाव और पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियों को लेकर कई बार टकराव की स्थिति बन चुकी है।
यदि भविष्य में किसी सैन्य कार्रवाई की संभावना बनती है, तो डिएगो गार्सिया जैसे सुरक्षित अड्डे की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। रिपोर्टों में यह भी सामने आया कि संभावित अभियानों को लेकर ब्रिटेन और अमेरिका के बीच एयरबेस उपयोग पर चर्चा हुई थी।
ब्रिटेन सार्वजनिक रूप से संयम बरतना चाहता है, जबकि अमेरिका अपनी सैन्य तैयारियों को लेकर स्पष्ट रुख अपनाए हुए है। यही अंतर दोनों देशों के बीच मतभेद की वजह बन रहा है।
🔹 ब्रिटेन की दुविधा और आर्थिक पहलू
United Kingdom इस समय कूटनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। एक ओर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की राय और संयुक्त राष्ट्र का दबाव है, दूसरी ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी।
यदि ब्रिटेन समझौते को वापस लेता है या बदलता है, तो उसे मॉरीशस को भारी आर्थिक मुआवजा देना पड़ सकता है। इससे उसकी घरेलू राजनीति और अंतरराष्ट्रीय छवि पर असर पड़ सकता है।
ब्रिटिश सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह ऐतिहासिक न्याय और आधुनिक सुरक्षा आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करे।
🔹 हिंद महासागर में शक्ति संतुलन और भारत की भूमिका
India के लिए हिंद महासागर क्षेत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत मॉरीशस के साथ घनिष्ठ संबंध रखता है और क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देता है।
भारत खुलकर किसी पक्ष में नहीं है, लेकिन वह यह सुनिश्चित करना चाहता है कि हिंद महासागर में बाहरी शक्तियों का असंतुलित प्रभाव न बढ़े। चीन की बढ़ती समुद्री गतिविधियों को लेकर पहले से ही रणनीतिक प्रतिस्पर्धा जारी है। ऐसे में डिएगो गार्सिया का मुद्दा व्यापक भू-राजनीतिक समीकरण का हिस्सा बन जाता है।
🔹 स्थानीय समुदाय और मानवीय प्रश्न
चागोस द्वीप समूह के मूल निवासियों को दशकों पहले जबरन हटाया गया था। आज भी वे अपने अधिकारों और पुनर्वास की मांग कर रहे हैं।
यदि संप्रभुता मॉरीशस को मिलती है, तो संभव है कि इन विस्थापित समुदायों के पुनर्वास पर नई चर्चा शुरू हो। यह मुद्दा केवल कूटनीतिक या सैन्य नहीं, बल्कि मानवीय और नैतिक भी है।
🔹 आगे क्या हो सकता है
वर्तमान स्थिति में कूटनीतिक बातचीत जारी है। संभावित परिदृश्य यह हो सकते हैं कि समझौता लीज मॉडल के साथ लागू हो जाए, या अमेरिकी दबाव के चलते उसमें संशोधन हो। यदि क्षेत्रीय तनाव बढ़ता है, तो यह मुद्दा और संवेदनशील हो सकता है।
डिएगो गार्सिया का विवाद दिखाता है कि 21वीं सदी में भी उपनिवेशवाद की विरासत, अंतरराष्ट्रीय कानून और सैन्य रणनीति किस तरह एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
यह मामला आने वाले महीनों में वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बन सकता है।
क्या ब्रिटेन को मॉरीशस को संप्रभुता सौंप देनी चाहिए या अमेरिका की रणनीतिक चिंताओं को प्राथमिकता देनी चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।
